तुमसे तुम्हारी बातें करता हूँ मैं, तुम्हारे बिना!
एक चिड़िया किचन की खिड़की पर आई थी. एकदम सुबह की बात है. आज सन्डे था. मेरा ऑफ का दिन. मैं उस वक़्त बर्तन धुल रहा था.
पता है, वो चिड़िया अंदर आने की कोशिश कर रही थी. सामने मैं था तो झिझक रही थी. मैंने खिड़की का दूसरा पल्ला खोल दिया. वो झट से अंदर आ गयी. थोड़ी देर इधर उधर किया फ़िर दाल का एक दाना लेकर उड़ गयी.
कुछ वादे यूँ ही याद आ जाते हैं. अधूरे वादे. किसी से निभाने के लिए किए गए और नहीं पूरे हुए. उसका अधूरापन ही टीस बनकर रह जाता है. वादा तभी याद रहता है जब वो अधूरा रह जाता है. जैसे कितने दिनों से मेरी एक कहानी अधूरी है. मैंने वादा किया था उससे कि जल्दी में नहीं लिखूँगा उसे. और वो अभी अधूरी है.
मुझे याद है कि मैं उड़ना चाहता था. हमेशा. लेकिन, जब उड़ता था तो गिर जाता और नींद टूट जाती थी. बार बार ऐसा होता. माँ कहती तेरा मन एक जगह ठहरा नहीं रहता. इसीलिए ऐसे सपने आते हैं. मैं हँसकर टाल देता. आज जब याद करता हूँ तो लगता है कि सच में मेरा मन ठहरा नहीं करता. मुझे वो सब कुछ चाहिए होता है जो मैं सोच लेता हूँ.
माँ, हमेशा सच होती है. झूठ तो हमारा किरदार होता है जो माँओं का दिल दुखाया करता है. मैंने माँ को देखा है तेज धूप में चूल्हे पर हम सब के लिए खाना बनाते हुए. बिना किसी शिकायत के. माँ की गोद में सिर रख के सोए कई साल हो गए.
सुकून की नींद अब कहाँ आती है. घर से घर संभालने के लिए निकलने के बाद सुकून की नींद नहीं मिलती. सुकून होता है जब अकेलेपन का जश्न मनाना आ जाता है. पता है मैंने इसे सीख लिया है. मैं अक्सर यूँ ख़ुश हो लिया करता हूँ अपनी ही करतूतों पर. टेबल पर बैठ कर घंटों बिता दिया करता हूँ. एक दो फ़िल्मों के साथ.
तुम बताओ, आजकल क्या हो रहा है?
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