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प्याज का मारा किसान बेचारा: एक और सत्य यह भी है जो आप नहीं समझते


एपीएमसी की वेबसाइट पर सोमवार को प्याज का भाव 22.50-42.50 रुपये प्रति किलोग्राम था और आवक का आंकड़ा 1,370.9 टन दर्ज की गई. शर्मा ने बताया कि देश के प्रमुख प्याज उत्पादक राज्यों में हुई भारी बारिश के कारण नई फसल खराब होने और उसकी आवक में विलंब होने की आशंकाओं से प्याज की आवक अभी भी खपत के मुकाबले कम है, जबकि ऊंचे भाव के कारण खपत में कमी आई है.

पिछले हफ्ते प्याज की आवक घटने से इसका थोक भाव 50 रुपये प्रति किलोग्राम से ऊंचा हो गया था, जबकि दिल्ली और एनसीआर के विभिन्न बाजारों में प्याज का खुदरा भाव करीब 75 रुपये प्रति किलोग्राम हो गया था.
बताया जा रहा है कि भारी बारिश के कारण काले कारोबार में संलिप्त लोगों ने प्याज का भंडारण कर लिया है. जिस कारण से प्याज बाजार तक नहीं पहुंच रहा है और लोगों को महंगा प्याज खरीदनी पड़ रही है. जो प्याज आ रही है, उसकी क्वालिटी भी ठीक नहीं है. इस कारण प्याज 40 से 50 रुपये किलो तक बिक रही है.



प्याज की कीमत बढ़ाने में सबसे बड़ा रोल बारिश ने अदा किया है. बारिश की वजह से महाराष्ट्र, हिमांचल प्रदेश में बारिश और बाढ़ के चलते प्याज की फसल बर्बाद हो गई है. इससे लगातार प्याज की कीमतों में इजाफा हो रहा है. साथ ही तेजी के साथ प्याज का भाव बढ़ता देखकर कारोबारियों द्वारा मुनाफा के चक्कर में प्याज को स्टोर करने से भी भाव में बढ़ोत्तरी की प्रमुख वजह है.

मनी भास्कर की साल 2016 की एक रिपोर्ट के अनुसार
रबी सीजन में रकबा बढ़ने के कारण इस बार प्याज का रिकॉर्ड उत्पादन होने का अनुमान लगाया जा रहा है. नेशनल हॉर्टिकल्‍चर रिसर्च और डेवलपमेंट फाउंडेशन के डायरेक्टर आरपी गुप्ता के मुताबिक इस साल प्याज का उत्पादन 10-15 फीसदी ज्यादा यानी लगभग 2 करोड़ टन रह सकता है. प्याज का उत्पादन 2 करोड़ टन होने से 2013-14 का 1.94 करोड़ टन का रिकॉर्ड टूट सकता है.


भारत में प्याज की फसल की साल में 3 बार बुआई होती है. खरीफ और लेट खरीफ सीजन में करीब 40-45 फीसदी प्याज का उत्पादन होता है, जिसकी कटाई अक्टूबर-दिसंबर और जनवरी-मार्च में होती है. जबकि रबी फसल की कुल उत्पादन में 60 फीसदी हिस्सेदारी होती है. इसकी कटाई मार्च–मई के दौरान होती है.




2014-15 में कुल 11.5 लाख हेक्टेयर में प्याज की फसल की बुआई हुई थी. पिछले साल की रबी फसल भारी बारिश और ओले पड़ने से खराब हो गई थी. इसके कारण 2015 जून में प्याज के दाम बढ़ने शुरू हो गए थे.

अगस्त 2015 में लासलगांव में प्याज का भाव 4,100-4,200 क्विंटल था, जो जुलाई के मुकाबले 95 फीसदी ज्यादा था. इसके बाद प्याज की कीमतों में नरमी आनी शुरू हुई. फिलहाल प्याज के भाव 1,400 क्विंटल के आसपास हैं, जो मासिक आधार पर 19 फीसदी और वार्षिक आधार पर 14 फीसदी कम हैं.

होर्टिकल्चर एसोसिएशन के प्रेसिडेंट अजित सिंह के मुताबिक, प्याज की फसल से किसानों को पिछले कई सालों से अच्छा रिटर्न मिल रहा है, जिसके कारण इस साल प्याज के रकबे में बढ़ोतरी हुई है.

द क्विंट ने साल 2016 की एक रिपोर्ट में लिखा है कि
अगस्त 2015 में प्याज की होलसेल कीमत 5700 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गई थी. बाद में साल 2016 की शुरुआत के बाद लासलगांव में प्याज की होलसेल कीमत 650-550 रुपये प्रति क्विंटल तक रही हैं. अब किसानों के पास स्टॉक खत्म हो रहा है. स्टॉक खत्म होने के बाद बाजार में प्याज की कीमतें तेजी से बढ़ेंगी.

मनी भास्कर ने 2017 की एक रिपोर्ट में लिखा है

देश में प्‍याज की कीमतों को कंट्रोल करने के लिए सरकार की कोशिशें नाकाम साबित हो रही हैं. प्‍याज की कीमतों में तेजी बनी हुई है और देश की राजधानी दिल्‍ली में खुदरा प्‍याज की कीमत 80 रुपए प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई है. ट्रेड डाटा के मुताबिक प्याज के दाम में इसी तरह का उछाल दूसरे शहरों में देखा गया. बता दें कि प्राइस कंट्रोल के लिए सरकार ने हाल ही में न्‍यूनतम एक्‍सपोर्ट प्राइस (MEP) व्‍यवस्‍था लागू की थी.

इकॉनॉमिक टाइम्स ने नवंबर 2017 की एक रिपोर्ट में लिखा है कि


क्यों बढ़े दाम
जानकारों का कहना है कि मॉनसून में शुरुआती देरी और अक्टूबर में हुई बारिश से खरीफ की फसल की कटाई में लगभग 15 दिन की देरी हुई है. महाराष्ट्र में सितंबर में भारी बारिश होने से प्याज की खरीफ फसल खराब हो गई है. इसके अलावा दक्षिण भारत में भारी बारिश की वजह से फसल 10-15 दिन लेट हो गई है.

सरकार ने उठाए हैं ये कदम
सरकार ने इसके निर्यात के लिए न्यूनतम निर्यात मूल्य तय कर दिया है. इसका न्यूनतम निर्यात मूल्य 850 डॉलर प्रति टन तय किया गया है. इसके अलावा सरकारी एजेंसियों के जरिए प्याज आयात करने की भी तैयारी है. एमएमटीसी 2 हजार टन प्याज का इंपोर्ट करेगी. नैफेड और एसएफएसी घरेलू बाजार से 12 हजार टन प्याज खरीदेंगी.

यहां होता है सबसे ज्यादा प्याज उत्पादन
देश के दो बड़े प्याज उत्पादक राज्य महाराष्ट्र और कर्नाटक हैं. इसके अलावा मध्य प्रदेश, बिहार और गुजरात का नंबर आता है. नासिक की लासलगांव मंडी प्याज की सबसे बड़ी मंडी है.



क्यों बढ़ी प्याज की कीमत, 5 बड़ी वजहें 
  1. उपभोक्ता मंत्रालय के सीनियर अधिकारी के मुताबिक इस साल खरीफ सीजन में प्याज का उत्पादन 10 फीसदी कम रहने का अनुमान है क्योंकि इस सीजन में बुआई रकबा 30 फीसदी घटा है. देश में 40 फीसदी प्याज की सप्लाई खरीफ सीजन से पूरी होती है.
  2. इस साल प्रमुख उत्पादक राज्यों में रबी की फसल के दौरान मार्च में हुई बेमौसम बारिश ने उत्पादन पर असर डाला था. पूरे साल की कुल जरूरत का करीब 60 फीसदी रबी की फसल से पूरा होता है. 
  3. सितंबर में महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश कुछ इलाकों भारी बारिश और कर्नाटक इसके अलावा देर से बारिश से फसल थोड़ी देर से आएगी. खरीफ की नई फसल को आने में अभी 10-15 दिन का समय लगेगी 
  4. बड़े व्यापारी मुनाफाखोरी के लिए जमाखोरी करते हैं. प्याज मंडियों में की गई जांच में सीसीआई ने व्यापारियों और सप्लायर्स के बीच एक ऐसा गठजोड़ पाया, जोकि प्याज की कीमतों को नियंत्रित करता है. 
  5. सही रखरखाव की कमी से 20 फीसदी प्याज हर साल खराब हो जाता है.

हिंदुस्तान टाइम्स ने सितंबर 2019 की एक रिपोर्ट में लिखा है कि 
व्यापारिक आंकड़ों से पता चला है कि सीमित आपूर्ति के कारण राजधानी दिल्ली में बी प्याज की खुदरा कीमत 70-80 रुपये प्रति किलोग्राम के बीच चल रही हैं. कीमत की यही स्थिति देश के अन्य हिस्सों में भी है. केंद्र सरकार का मानना है कि प्याज की कालाबाजारी और जमाखोरी की वजह से इसके दामों में जबरदस्त उछाल आया है.  केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री राम विलास पासवान ने मंगलवार को प्याज की कालाबाजारी और जमाखोरी के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की चेतावनी दी. उन्होंने कहा कि सरकार स्टॉक लिमिट लगाने पर भी विचार कर सकती है.

2015 के बाद इतना बड़ा उछाल
मंडी के कारोबारियों के अनुसार, 2015 के बाद पहली बार देश में प्याज इतने महंगे भाव मिलने लगे थे. गौरतलब है कि बीते सप्ताह दिल्ली में प्याज का थोक भाव 50 रुपये प्रति किलो से ऊपर चला गया था जब देश की राजधानी में प्याज का खुदरा भाव 70-75 रुपये प्रति किलो हो गया था. देश के अन्य हिस्सों में भी प्याज के दाम आसमान छूने लगे थे. महाराष्ट्र जैसे देश के प्रमुख प्याज उत्पादक राज्य में बाढ़ के कारण मंडियों में आपूर्ति प्रभावित हुई है. इस कारण एक महीने में प्याज में तेजी आयी है. पिछले सप्ताह की बारिश ने आपूर्ति को और प्रभावित किया है, जिसके कारण राष्ट्रीय राजधानी और देश के अन्य हिस्सों में प्याज के दाम चढ़ कर 70-80 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गए गए हैं.


प्रभात खबर ने अपनी सितंबर 2019 की एक रिपोर्ट में लिखा है कि 
केंद्रीय उपभोक्ता मामलों के मंत्री ने कहा कि सरकार के पास 50 हजार टन का बफर स्टॉक है और बाढ़ के कारण इसकी आपूर्ति पर असर पड़ा है. उन्होंने जमाखोरों को सख्त चेतावनी दी और कहा कि जल्द ही प्याज की कीमतें कम हो जायेगी. कीमतों को नियंत्रण में करने के लिए कुछ कदम उठाये गये हैं.

सरकार ने निर्यात को कम करने के लिए न्यूनतम निर्यात मूल्य को 850 डॉलर प्रति टन कर दिया. लेकिन इससे अपेक्षित परिणाम हासिल नहीं हुए. इसके बाद सरकार ने स्टॉक लिमिट तय करने पर विचार किया. लेकिन चुनाव के कारण किसानों के हित को देखते हुए यह फैसला फिलहाल टाल दिया गया है.

उन्होंने कहा कि सरकार को उपभोक्ता और किसान दोनों के हितों को देखना है. सरकार आवश्यक वस्तु अधिनियम कानून 1955 के तहत जमाखोरी रोकने के लिए कुछ समय के लिए किसी वस्तु का स्टॉक रखने की सीमा निर्धारित कर सकती है. 

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