2019 लोकसभा चुनाव : एक बड़ा खेल खेलने को तैयार है भाजपा, दांव लंबा चलेगी
ये आंकड़ा बताता है कि जीतना तो भाजपा किसी भी हाल में चाहेगी
साल 2014। ये साल एक महाकुंभ जैसा ही था। इसमें थी अगाध श्रद्धा, अपनापन, प्रेम, जाति-पाति से ऊपर के विचार और साथ में थे काम बोलता है, सबका साथ-सबका विकास जैसे परम शब्द। फर्क सिर्फ इतना था कि ये महाकुंभ धर्म का नहीं राजनीति का था।
इस राजनीतिक महाकुंभ में कई धर्म और विचारों की डुबकियां लगाई जा रही थीं। कई ऐसे वादे किए जा रहे थे जो अपने साधकों के सीने को श्रद्धा से भर दे रहे थे। फिर बात चल आई श्मशान-कब्रिस्तान से होते हुए मंदिर तक। किसी ने कहा उसने नहीं किया काम हमने किया। किसी का काम बोल रहा था, कोई सबको साथ लेकर चलता हुआ विकास कर रहा था।
अभी बीते दौर की बात करें तो इस दौरान ऐसे खुलासे भी हुए, जिन्होंने बसपा जैसी पार्टी को नेस्तनाबूत कर दिया। मायावती, जिनकी पार्टी है बसपा, उनके सबसे नजदीकी माने जाने वाले नसीमुद्दीन ने जो बखिया उधेड़ी की पूरी की पूरी पार्टी औंधे मुंह जा गिरी। 2017 में हुआ विधानसभा चुनाव बसपा के लिए सबसे हानिकारक साबित हुआ।
ये है नसीमुद्दीन और मायावती की बातचीत का ऑडियो...(सोर्स से)
इस दौरान कांग्रेस और सपा भी साथ में आए। पूरा जोर लगाया गया कि विपक्ष को कुर्सी नहीं पाने देना है, इसके लिए चाहे कुछ भी करना पड़े। मंच से न जाने कितनी बार समाजवादी पार्टी के मौजूदा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मायावती को नीचे गिराने की कोशिश की। बुआ-भतीजा वार लगातार जारी रहा।
क्या कहते हैं पिछले एक साल के आंकड़े-
उपचुनाव:
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर और फूलपुर में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन ने बीजेपी को मात दी थी। फूलपुर में सपा प्रत्याशी नागेंद्र पटेल ने बीजेपी के कौशलेंद्र पटेल को 59613 वोटों से हराया। वहीं, फूलपुर यूपी के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की सीट थी। सीएम योगी आदित्यनाथ की सीट गोरखपुर पर भी सपा प्रत्याशी प्रवीण निषाद ने बीजेपी के उपेंद्र पटेल को हरा दिया था।
गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनावों के बाद उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा सीट और नूरपुर विधानसभा सीट के उपचुनाव हुए। यहां भी विपक्षी एकजुटता के आगे सत्तारूढ़ भाजपा को एक बार फिर शिकस्त का सामना करना पड़ा। दोनों ही सीटों पर सपा-रालोद गठबंधन के प्रत्याशियों ने गुरुवार को जीत हासिल कर ली।
निर्वाचन आयोग के ने रिपोर्ट जारी कर बताया, कैराना लोकसभा उपचुनाव में रालोद उम्मीदवार तबस्सुम हसन ने अपनी निकटतम प्रतिद्वंद्वी भाजपा प्रत्याशी मृगांका सिंह को 44,618 मतों से हराया था। तबस्सुम को 4,81,182 और मृगांका को 4,36,564 वोट मिले थे।
विधानसभा चुनाव:
पहले बात करते हैं गुजरात चुनाव की। यहां पर पोस्टर ब्वॉय थे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ। योगी आदित्यनाथ का यूज भाजपा ने सिर्फ और सिर्फ हिन्दुत्व का एजेंडा साधने के लिए किया था। हालांकि इस प्रयास में भाजपा को बहुत ही मुश्किल हुई, लेकिन अंत में जीत उसके पाले में ही आई।
फिर त्रिपुरा, नागालैंड और मेघालय के विधानसभा चुनाव में यही हाल था। भाजपा के लिए ये चुनावी जंग बहुत ही मुश्किल साबित हो रहा था। यहां पर भी एक ही आदमी काम आया। उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ। योगी की रैलियों का ही परिणाम था कि पिछले 25 साल से वाम मोर्चे की सरकार होने के बावजूद भाजपा ने किले को भेद दिया।
क्या कहते हैं पिछले एक साल के आंकड़े-
उपचुनाव:
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर और फूलपुर में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन ने बीजेपी को मात दी थी। फूलपुर में सपा प्रत्याशी नागेंद्र पटेल ने बीजेपी के कौशलेंद्र पटेल को 59613 वोटों से हराया। वहीं, फूलपुर यूपी के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की सीट थी। सीएम योगी आदित्यनाथ की सीट गोरखपुर पर भी सपा प्रत्याशी प्रवीण निषाद ने बीजेपी के उपेंद्र पटेल को हरा दिया था।
गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनावों के बाद उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा सीट और नूरपुर विधानसभा सीट के उपचुनाव हुए। यहां भी विपक्षी एकजुटता के आगे सत्तारूढ़ भाजपा को एक बार फिर शिकस्त का सामना करना पड़ा। दोनों ही सीटों पर सपा-रालोद गठबंधन के प्रत्याशियों ने गुरुवार को जीत हासिल कर ली।
निर्वाचन आयोग के ने रिपोर्ट जारी कर बताया, कैराना लोकसभा उपचुनाव में रालोद उम्मीदवार तबस्सुम हसन ने अपनी निकटतम प्रतिद्वंद्वी भाजपा प्रत्याशी मृगांका सिंह को 44,618 मतों से हराया था। तबस्सुम को 4,81,182 और मृगांका को 4,36,564 वोट मिले थे।
विधानसभा चुनाव:
पहले बात करते हैं गुजरात चुनाव की। यहां पर पोस्टर ब्वॉय थे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ। योगी आदित्यनाथ का यूज भाजपा ने सिर्फ और सिर्फ हिन्दुत्व का एजेंडा साधने के लिए किया था। हालांकि इस प्रयास में भाजपा को बहुत ही मुश्किल हुई, लेकिन अंत में जीत उसके पाले में ही आई।
फिर त्रिपुरा, नागालैंड और मेघालय के विधानसभा चुनाव में यही हाल था। भाजपा के लिए ये चुनावी जंग बहुत ही मुश्किल साबित हो रहा था। यहां पर भी एक ही आदमी काम आया। उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ। योगी की रैलियों का ही परिणाम था कि पिछले 25 साल से वाम मोर्चे की सरकार होने के बावजूद भाजपा ने किले को भेद दिया।
कुल मिला जोड़-घटाव में ये हो सकता है:
2014 का लोकसभा चुनाव उत्तर प्रदेश से जीता गया। ये साबित करती है भाजपा की जीती हुई सीट। भाजपा ने कुल 282 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिसमें से अकेले उत्तर प्रदेश से ही 2.3 फ़ीसदी वोट के साथ 71 सीटें हासिल कीं। इस जीत में क्या चीजें काम आईं?
नरेंद्र मोदी के दौरों का निचोड़ देखिए...(सोर्स से)
ये तो हो गई हल्की सी राजनीतिक दांव-पेंच। असल मुद्दा तो श्मशान की जमीन, राम मंदिर का बात-बात में जिक्र और कश्मीर मुद्दा हर बार उछाला जाना। इस बीच कांग्रेस के लिए सबसे कमजोर कड़ी साबित हुई बेरोजगारी और महंगाई। इसका फायदा भी भाजपा उठाने में आगे रही।
आगे भी दो बदलाव हो सकते हैं और कुछ मुद्दे कायम रहेंगे। पहला तो ये कि कांग्रेस तो बिल्कुल दरकिनार करते हुए भाजपा मायावती से हाथ मिलाने की कोशिश कर सकती है। मायावती को वह पद का लोभ देकर उन्हें गठबंधन तोड़कर अपनी भाजपा का समर्थन करने को कहेगी। वहीं, बिहार में नीतीश से समर्थन लेने की पूरी कोशिश तो है ही। भाजपा उत्तर प्रदेश से अगर सीटें ज्यादा निकालना चाहेगी तो उसे 2014 वले प्लान में पूरा फेरबदल करना होगा। यानि कि राम मंदिर का मुद्दा, तीन तलाक का मुद्दा तो बहुत कम ही आगे जा पाया है, तो इस मुद्दे को हथियार न बनाए।
वीडियो : लोकसभा चुनाव परिणाम...(सोर्स से)
दूसरा ये कि, लाख मना करने पर भाजपा तीन तलाक और राम मंदिर मुद्दा लेकर दांव फिर से खेलेगी। यहां पर भाजपा भावनाओं के साथ खेलने से बिल्कुल भी नहीं चूकने वाली। क्योंकि अमित शाह और नरेंद्र मोदी को ये पता है कि इस गठबंधन ने उपचुनाव में पटखनी लगातार दी है। तो यहां पर भाजपा कई ऐसे चेहरे अपनी पार्टी में शामिल करेगी जो दूसरी पार्टियों के आइकॉन के तौर पर जाने जाते रहे हैं। चेहरे कौन होंगे ये अमित शाह तय करेंगे। लेकिन, किसी भी हाल में मोदी ये चुनाव अपने हाथ से नहीं जाने देना चाहेंगे।
2014 का लोकसभा चुनाव उत्तर प्रदेश से जीता गया। ये साबित करती है भाजपा की जीती हुई सीट। भाजपा ने कुल 282 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिसमें से अकेले उत्तर प्रदेश से ही 2.3 फ़ीसदी वोट के साथ 71 सीटें हासिल कीं। इस जीत में क्या चीजें काम आईं?
- हिन्दुत्व
- तीन तलाक
- विपक्ष की फीकी पड़ती छवि
- प्रधानमंत्री उम्मीदवार का सबसे ज्यादा समय यूपी में बिताना
नरेंद्र मोदी के दौरों का निचोड़ देखिए...(सोर्स से)
ये तो हो गई हल्की सी राजनीतिक दांव-पेंच। असल मुद्दा तो श्मशान की जमीन, राम मंदिर का बात-बात में जिक्र और कश्मीर मुद्दा हर बार उछाला जाना। इस बीच कांग्रेस के लिए सबसे कमजोर कड़ी साबित हुई बेरोजगारी और महंगाई। इसका फायदा भी भाजपा उठाने में आगे रही।
आगे भी दो बदलाव हो सकते हैं और कुछ मुद्दे कायम रहेंगे। पहला तो ये कि कांग्रेस तो बिल्कुल दरकिनार करते हुए भाजपा मायावती से हाथ मिलाने की कोशिश कर सकती है। मायावती को वह पद का लोभ देकर उन्हें गठबंधन तोड़कर अपनी भाजपा का समर्थन करने को कहेगी। वहीं, बिहार में नीतीश से समर्थन लेने की पूरी कोशिश तो है ही। भाजपा उत्तर प्रदेश से अगर सीटें ज्यादा निकालना चाहेगी तो उसे 2014 वले प्लान में पूरा फेरबदल करना होगा। यानि कि राम मंदिर का मुद्दा, तीन तलाक का मुद्दा तो बहुत कम ही आगे जा पाया है, तो इस मुद्दे को हथियार न बनाए।
वीडियो : लोकसभा चुनाव परिणाम...(सोर्स से)
दूसरा ये कि, लाख मना करने पर भाजपा तीन तलाक और राम मंदिर मुद्दा लेकर दांव फिर से खेलेगी। यहां पर भाजपा भावनाओं के साथ खेलने से बिल्कुल भी नहीं चूकने वाली। क्योंकि अमित शाह और नरेंद्र मोदी को ये पता है कि इस गठबंधन ने उपचुनाव में पटखनी लगातार दी है। तो यहां पर भाजपा कई ऐसे चेहरे अपनी पार्टी में शामिल करेगी जो दूसरी पार्टियों के आइकॉन के तौर पर जाने जाते रहे हैं। चेहरे कौन होंगे ये अमित शाह तय करेंगे। लेकिन, किसी भी हाल में मोदी ये चुनाव अपने हाथ से नहीं जाने देना चाहेंगे।

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