संवादः मैं वो नहीं जो दुनिया समझती है, मैं वो हूँ जो मैं सोचता हूँ
रोज सुबह उठना। और, उठकर खुद को भी उठाना। ये रोज का काम थोड़ा सा भारी लगता है, लेकिन अच्छा लगता है। सुबहें बिल्कुल उसी तरह उठती हैं जैसे मैं उनको उठाना चाहता हूँ। कभी-कभी पर काम पर जाने के लिए उठना तो कभी यूँ ही उठकर सुबहों को परेशान कर सो जाना।
मैं खुद को काम पर जाने के लिए तैयार करता हूँ। अच्छा लगता है। बगल वाले कमरों में कई लोग रहते हैं। सुबह तीन बजे से बर्तन धुलने, खाना पकाते समय कड़ाही में सब्जी चलाने और कूकर से सीटी की आवाज आती है।
मैं पूछता हूँ, 'खाना बनाओगे?'
मैं जवाब देता हूँ, 'नहीं यार छोड़ो आलस आ रही है।'
खुद को देखना कितना अजीब लगता है न। लेकिन, जब आदमी चारदीवारों के बीच बिल्कुल अकेला बैठा सोच रहा होता है तो उसे सबसे पहले वही दिखाई देता है। कभी दीवारों पर रेंगता हुआ। छिपकली या काकरोच जैसा कुछ। कभी चींटियों के साथ उनके लिए खाना लाने निकला जाता है।
मैं खुद को चीटियों के साथ जाता हुआ देख रहा था। कमरे से उठा और किचन से थोड़ा सा आटा ले आया। चीटियों के साथ लाइन में लगे हुए अपने आप के सामने थोड़ा आटा डाल दिया। आटा मेरे चेहरे पर गिर गया। मैं जाग गया।
मैं मेरे साथ हर रोज़ होता हूँ। कभी बस में, कभी कैब में तो कभी गलियों में पैदल चलता हुआ दिख जाया करता हूँ।
'सुन भाई, चाय पीने चलेगा?' मैंने मुझसे पूछा।
'नहीं अभी तो पीया है।' मैंने जवाब दिया।
'कितनी देर पहले?'
'अच्छा चलो. पी आते हैं।'
मैं दोनों जगहों पर अलग होता हूँ, लेकिन जब चाय की बारी आती है तो मैं और मैं दोनों एक जैसा सोचने लगते हैं। मुझे लगता है चाय पीने के बाद भूख कम लगती है या भूख 1-2 घंटे के लिए गायब हो जाती है।
'सुन न भाई, चाय पी लिया। अब भूख लग रही है।' मैंने मुझसे कहा।
'खाना अभी? हाँ ठीक है मुझे भी भूख लग रही है।' मैंने जवाब दिया।
मैं किचन में खड़ा हूँ। अब बर्तनों को देख रहा हूँ। बर्तन कुछ धुलने के लिए पड़े हैं और कुछ तो बिना मतलब के किनारे पर पड़े ऊँघ रहे हैं। साल भर से इनका मैंने इस्तेमाल ही नहीं किया है। किचन में एक तरफ से आलमारी बनी है। दूसरी तरफ से पानी का टैप लगा हुआ है और उसकी तरफ को एक खिड़की खुलती है।
'खिड़की मत खोलना।' मैंने मुझसे कहा।
'क्यों?'
'बाहर से आते-जाते लोग दिखते हैं। और, किचन में झांककर जाते हैं।' मैंने जवाब दिया।
'तुम भी न।' मैंने इतना कहते हुए किचन आधी खुली हुई खिड़की बंद कर दी।
अब खाना बनकर तैयार है और मैं खाना खा भी चुका हूँ। मुझे अभी तक ये नहीं पता चल सका है कि मैं अकेला हूँ। मैं तैयार होने की प्रक्रिया में शामिल हो चुका हूँ। काम पर जाना वो भी रोजाना। खतरनाक प्रक्रियाओं में से एक है, जबकि मन और दिल बिल्कुल तैयार न हो।
मैं अभी पूजा घर के पास हूँ और मैंने मुझसे शर्ट ऑयरन करने के लिए बोल दिया है। मैं जल्दी में शर्ट ऑयरन कर रहा हँ। इधर मैं तबतक पूजा करने के बाद कपड़े पहनने लगा। इस पूरी प्रक्रिया में मैंने मेरा सहयोग किया। खुद को काम पर जाने के लिए तैयार करना थोड़ा सा बोझिल काम है, लेकिन काम पर जाना एक प्रक्रिया है। इसे दोहराना इसे खतरनाक प्रक्रिया में शामिल करता है।
मैंने खुद को तैयार किया। अब काम पर जाने का वक़्त होने पर कमरे की लाइटें बंद कीं। पंखे का स्विच ऑफ़ किया और जूता पहनने लगा। मैंने मोजे पहनने के लिए खुद का हाथ पकड़कर सहारा दिया। सब कुछ पूरा हुआ।
मैं बाहर निकला। दरवाजा बंद करने को हुआ तो बोला, 'चलो बाहर निकलो जल्दी, देर हो रही है।' कमरे के भीतर से कोई ज़वाब नहीं आया।
मैंने फिर कहा, 'जल्दी कर न भाई। देर हो जाएगी।' फिर भी कोई ज़वाब नहीं आया।
मैं कमरे में गया और खुद को तलाशा। मैं वहाँ था ही नहीं। मैं मेरे बाहर निकलने के साथ ही बाहर आ चुका था। मैं वापस आया और कमरे के दरवाजे पर बाहर से ताला बन्द किया। कभी-कभी कुछ आदतें ऐसी ही होती हैं। हम सोचते हैं कि हम अकेले जी रहे हैं, लेकिन अकेले नहीं होते। जब लगता है हम हमारे साथ हैं तो हम अकले पाए जाते हैं।
मुझे देखने के बाद ये अनुमान लगाया जा सकता है कि मैं किसी के बारे में कुछ सोच रहा हूँ, लेकिन उस समय जो कुछ मेरी कहानी में लिखा जा रहा होता है, वैसा ही भाव मेरे चेहरे में बनता-बिखरता रहता है। मैं अभी इस कहानी को लिख रहा हूँ तो मैं खुद को लिखता हुआ देख रहा हूँ।
वक़्त की एक आदत है कि ये वक़्त लगाता है। वक़्त लगेगा मुझे समझने में। मैं अकसर किसी को देखता हूँ तो उसकी एक कहानी बुनने लगता हूँ या किसी कहानी में उसके लिए किसी पात्र का चुनाव करने लगता हूँ। इस चक्कर मे मैं भूल जाता हूँ कि सामने वाले को बुरा लग रहा होगा। मैं मेरी ही इस आदत से परेशान हूँ। मैं वैसा नहीं होता हूँ जैसा सामने वाला सोच रहा होता है। मैं वैसा होतै हूँ जैसा मेरी कहानी कह रही होती है।
फर्क़ सिर्फ़ इतना है कि इसे लिखते समय मैंने अपने आप से परमिशन नहीं ली है।

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