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2 अप्रैल भारत बंद : स्याह रातें सुनीं हैं, देख लीजिये स्याह दिन

भारत बंद था या सोच-समझकर कराया गया?

फोटो- साभार गूगल इमेज।
पहले हम बात करते हैं भारत बंद की आवाज उठाई क्यों गई. जहां तक पहले ये समझ में आता है कि ये किसी मांग को लेकर उठाई गई जबरदस्त आवाज है, जिसे कई दिनों से दबाए रखा गया था. फिर थोड़ा सोचो तो समझ में आता है कि मांग तक ठीक है ये आग लगाना और जान-माल का नुकसान करना क्यों?

ये जो बवाल काटा गया है इसका असली जड़ किसे बताया जा रहा है?
क्योंकि, सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए एससी/एसटी ऐक्ट में तत्काल गिरफ्तारी न किए जाने का आदेश दिया था. इसके अलावा एससी/एसटी ऐक्ट के तहत दर्ज होने वाले केसों में अग्रिम जमानत को भी मंजूरी दी थी. शीर्ष अदालत ने कहा कि इस कानून के तहत दर्ज मामलों में ऑटोमेटिक गिरफ्तारी की बजाय पुलिस को 7 दिन के भीतर जांच करनी चाहिए और फिर आगे ऐक्शन लेना चाहिए. 

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 जब इतना भड़के हैं तो इस बात को भी ध्यान से पढ़ लें
शीर्ष अदालत ने ये भी कहा था कि सरकारी अधिकारी की गिरफ्तारी अपॉइंटिंग अथॉरिटी की मंजूरी के बिना नहीं की जा सकती. गैर-सरकारी कर्मी की गिरफ्तारी के लिए एसएसपी की मंजूरी जरूरी होगी. शीर्ष अदालत ने कहा कि हमने ऐक्ट को कमजोर नहीं किया है बल्कि गिरफ्तारी और सीआरपीसी के प्रावधान को परिभाषित किया है. शीर्ष अदालत ने तत्काल गिरफ्तारी के प्रावधान को लेकर कहा कि हमारा मकसद निर्दोष लोगों को फंसाने से बचाना है. निर्दोषों के मौलिक अधिकारों की रक्षा होनी चाहिए.

तो, सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एससी-एसटी ऐक्ट पर 20 मार्च को दिए गए अपने फैसले पर स्टे लगाने से साफ इनकार कर दिया. शीर्ष अदालत ने सभी पक्षों को इस मसले पर तीन दिन के भीतर जवाब देने का आदेश देते हुए 10 दिन बाद अगली सुनवाई की बात कही है.

क्या ये चुनाव से पहले का कोई 'महाआक्रमण' मान लिया जाय?
2019 नजदीक आ रहा है. लोकसभा के चुनाव इसी साल में होंगे. इस तरह से ये भी तो हो सकता है कि विपक्षी दल अपनी डूबती कश्ती को किनारे पर ठौर देने के लिए 'महाआक्रमण' का प्लान बना रहे हों! हो सकता है कि यह काण्ड बसपा ने खुद ही रचा हो! क्योंकि जिस तरह से चुनाव की गहमागहमी राजनीतिक दलों में मची है और मोदी लहर को रोकने का पूरा प्रयास किया जा रहा है, इससे तो यही समझ में आता है कि इस लहर को रोकने के लिए विपक्षी दलों को मुद्दा चाहिए होगा. और मुद्दा आपके सामने पेश हो चुका है.

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इस जलते मुद्दे को कौन भुनाएगा 'न्यू इंडिया' या महागठबंधन?
सवाल बहुत छोटा है, लेकिन इसके पीछे छल और कपट वाली राजनीति की बू आती है. जाति के नाम पर इंसान को 21वीं सदी में भी अगर जनता आपस में लड़ जा रही है तो ऐसा निश्चित है कि आने वाला भारत 'न्यू इंडिया' नहीं होगा. नए भारत का सपना जाति के नाम पर राजनीति करने से नहीं पूरा होने वाला. और, अगर भाजपा ही इस काण्ड का कर्ता-धर्ता है तो फिर इस बात पर भी शक करना चाहिए, क्योंकि सिर्फ एक साल लोकसभा चुनाव का बचा है. उसमें भी पहले से ही मोदी सरकार कई मुद्दों पर घिर चुकी है, एक और पड़ी लकड़ी? महागठबंधन को कोई बड़ा मुद्दा चाहिए था और ये वही मुद्दा है जो योगी-मोदी की जोड़ी को तोड़ सकती है. उसे चुनावी अखाड़े में पटखनी दे सकती है.

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तो भाजपा का पिछले दो साल का इतिहास जान लो
गुजरात चुनाव 2017:
2012 के मुकाबले बीजेपी को 16 सीटों का नुकसान हुआ, उसे 99 सीटें मिलीं. कांग्रेस की सीटें 61 से बढ़कर 77 हो गईं, अन्य को 6 सीटें मिलीं. बीजेपी का वोट शेयर 49.1%, जबकि कांग्रेस का 41.4% रहा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे विकास की जीत बताया.

यूपी विधानसभा चुनाव:
बीजेपी ने पहली बार 325 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत हासिल किया. दूसरे नंबर पर समाजवादी पार्टी रही. सपा ने कुल 47 सीटों पर जीत दर्ज की. तीसरे नंबर रही मायावती की बीएसपी, वह 19 सीटों पर चुनाव जीती है. कांग्रेस को 7 सीटों पर जीत मिली. 2012 विधानसभा चुनाव में सपा को 224, बीएसपी को 80 और बीजेपी को 47 सीटें मिली थीं.

त्रिपुरा की जीत सबसे बड़ीः
त्रिपुरा में लेफ्ट का ढाई दशक का किला ढह गया. 25 साल के शासन के बाद आखिरकार सीपीआईएम को यहां हार का मुंह देखना पड़ा है. लेफ्ट की इस बार के बाद वह अब देश में सिर्फ एक ही सीट पर सिमटकर रह गई है. लेफ्ट अब सिर्फ केरल में सीमिट होकर रह गई है. त्रिपुरा और नागालैंड की जीत के बाद भाजपा देश के 21 राज्यों में सरकार में है.

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