संगीत, संगीत और सिर्फ़ संगीत : उस्ताद बिस्मिल्लाह खान साहब
जब बात संगीत की हो और जिक्र शहनाई का हो तो दिल और दिमाग दोनों में सिर्फ एक ही चेहरा नजर आता है- उस्ताद बिस्मिल्लाह खां साहब। एक ऐसे फनकार, जिन्होंने अपने शहनाई वादन से दशकों तक पूरी दुनिया को अपना दिवाना बनाए रखा। लोकप्रियता के सर्वोच्च शिखर तक पहुंचने के बाद भी उनके अंदर जो सादगी थी उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है। आज यानि 21 अगस्त को उनकी 12वीं पुण्यतिथि है। संगीत के इस विरले फनकार के बारे में आइए जानते है कुछ खास बातें।
नाम के पीछे है एक अनोखी कहानी
ऐसा कहा जाता है कि जब बिस्मिल्लाह खां साहब के जन्म की खबर उनके दादा जी ने सुनी तो अल्लाह का शुक्रिया अदा करते हुए 'बिस्मिल्लाह' कहा और तब से उनका नाम बिस्मिल्लाह पड़ गया, लेकिन बिस्मिल्लाह खां का बचपन का नाम कमरूद्दीन खान बताया जाता है।
बनारस को अपनी और खुद को बनारस की पहचान बनाकर पेश किया
बिहार के डुमरांव गांव के एक पारंपरिक मुस्मिल परिवार में जन्में बिस्मिल्लाह खां बहुत छोटी उम्र में ही वाराणसी आकर बस गए थे। उनके पिता पैगम्बर बख्श खान भोजपुर के राजा के दरबारी संगीतकार थे। कहा जाता है कि जब वह ईद मनाने मामू के घर गए तो अपने मामू की शहनाई सुनकर उन्होंने खुद भी शहनाई सीखने का मन बना लिया था। शुरुआत में खां साहब को आम बालकों की तरह रियाज में काफी दिक्कतें आई, लेकिन किशोरावस्था में आते-आते वह शहनाई जैसे संगत वाघ यंत्र को शास्त्रीय संगीत के मुख्य वाघों के बीच जगह दिलाने में सफल रहे।
बनारस के साथ खां साहब का लगाव काफी गहरा था, वे बनारस में कम बल्कि बनारस उनकी रूह में ज्यादा रहता था। वे कहा करते थे कि 'पूरी दुनिया में चाहे जहां चले जाएं हमें सिर्फ हिंदुस्तान दिखाई देता है और हिंदुस्तान के चाहे जिस शहर में हों, हमें सिर्फ बनारस दिखाई देता है'। खान साहब मानते थे कि यह बनारस का ही कमाल था जिसने उनकी शहनाई के सुरों में रूमानियत भरी थी।
खान साहब यह भी कहा करते थे कि 'हमने कुछ पैदा नहीं किया है। जो हो गया, उसका करम है। हां, अपनी शहनाई में जो लेकर हम चले हैं वह बनारस का अंग है। जल्दबाजी नहीं करते बनारस वाले, बड़े इत्मीनान से बोल लेकर चलते हैं। जिंदगी भर मंगलागौरी और पक्का महल में रियाज करते जवान हुए हैं तो कहीं न कहीं बनारस का रस तो टपकेगा हमारी शहनाई में'।
दुनिया की दौलत एक तरफ और संगीत एक तरफ
बिस्मिल्लाह खां साहब बनारस की पहचान थे और आज भी हैं। वहां की तंग गलियां उन्हें हमेशा से पसंद रही है। वह संगीत को लेकर इतने गंभीर थे कि पैसे के लिए गाना या बजाना पसंद ही नहीं करते थे।
एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि वह कई बार उन जगहों पर भी शहनाई बजाकर आए जहां से उन्हें एक रुपया भी नहीं मिलता था, लेकिन उन लोगों का प्यार उनको वहां पर खींच ले जाता था। साल 2001 में भारत सरकार ने उन्हें भारत रत्न से नवाजा था। उस वक्त खुद लता मंगेशकर ने उन्हें फोन कर बधाई दी थी।
जब खां साहब ने एक बार लंदन में लाइव कॉसंर्ट किया तो वहां पर उनका स्वागत उस्ताद बिलायत खां साहब ने किया था। तब उन्होंने अपनी छोटी सी स्पीच में कहा था कि वह सालों बाद एक दूसरे से मिले हैं।
बिलायत खां साहब ने कॉसंर्ट के दौरान कहा कि यह दिन न सिर्फ उनके लिए बल्कि वहां मौजूद सभी श्रोताओं के लिए खास है क्योंकि बिस्मिल्लाह खां यहां मौजूद है। बता दें कि बिस्मिल्लाह खां ने फिल्म 'गूंज उठी शहनाई' के लिए संगीत दिया था, लेकिन उस वक्त वह इतने नाराज हुए कि फिर उन्होंने दूसरी फिल्म में संगीत नहीं दिया। वह अक्सर कहते थे कि दुनिया की दौलत एक तरफ और संगीत एक तरफ फिर भी वह भारी होगा। पैसे से संगीत को नहीं तोला जा सकता है। (Source)



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