भीड़तंत्र ने महिला को निर्वस्त्र किया है, ये सवाल मैं आपसे पूछ रहा हूँ, जवाब दीजिए
बिहार के भोजपुर ज़िले के बिहिया शहर में भीड़ के एक महिला को निर्वस्त्र कर घंटों घुमाने का मामला सामने आया है। पुलिस के मुताबिक भीड़ को इस महिला पर 19 साल के एक युवक की हत्या में शामिल होने का संदेह था।
पुलिस के मुताबिक उग्र भीड़ ने पहले कई घरों और गाड़ियों में आग लगा दी, फिर एक महिला को उसके घर से खींचा, उसे पहले बुरी तरह पीटा और फिर शहर के बीचों-बीच उसे निर्वस्त्र कर घुमाया।
पुलिस ने महिला को किसी तरह भीड़ से छुड़ाया। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया गया है। ज़िले के पुलिस अधीक्षक अवकाश कुमार ने इस मामले में बिहिया थाना प्रभारी समेत कई पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया है।
दो सवाल, दो बिन्दुओं पर, एक घटना के लिए-
1) समाज से
2) मीडिया से
(हालांकि मैं खुद मीडिया से जुड़ा हूं, लेकिन सवाल जो है वो कुछ और है)
(1) समाज से -
समाज है क्या? सिर्फ एक धारणा या एक संस्था जो सर्कुलर जारी करती है समाज में रहने के लिए आपके लिए क्या नियम, कायदे, कानून होंगे। आप किस तरह से यहाँ रह सकेंगे। समाज के मायने दरअसल समाज के कुछ चुनिंदा लोगों ने बदलकर रख दिए है। बिहार के भोजपुर जिले के बिहिया शहर में एक महिला को हत्या के शक़ में निर्वस्त्र कर सड़क पर घुमाया गया है। इसका वीडियो वायरल हो रहा है और कुछ जिम्मेदार लोगों ने बाकायदा बनाया भी है, जिम्मेदारों की बात बाद में।
जब ये सब कुछ हो रहा था तब समाज कहाँ था। सामाजिकता कहाँ चली गई थी। उस दौरान महिला ने सबके पैर पकड़े, माफी मांगी और सफाई भी दी कि उस पर गलत इल्जाम लगाए जा रहे हैं, लेकिन समाज के रक्षक उसकी शरीर को नंगा देखने पर उतारू थे। यह बदल रहा परिवेश हमारे समाज को दिशा नहीं दे सकेगा, बल्कि गर्त में ही ले जाएगा। इस फोटो को देखकर या वायरल हुए वीडियो को देखकर यह अंदाजा लगाना मुश्किल है कि कितने और नाबालिग बच्चे भी इस भीड़ में शामिल रहे होंगे, जो इस कृत्य में भागीदार बन गए थे।
ये बहुत ही भयावह है कि अब से बढ़ रहा यह सामाजिक ताना-बाना बहुत ही जल्द विकराल रूप ले लेगा, जिसे न तो कानून का डर होगा और न ही किसी कोर्ट का। ये इस तरह की घटनाओं को भीड़ की शक्ल में अंजाम दे रहे हैं। मॉब लिंचिंग या अन्य प्रकार के अपराध यह पुख्ता सबूत हैं कि हम और आप जिस समाज में बढ़ रहे हैं और हमारे पीछे पनप रही पौध उसका अनुसरण कर रही है, वह समाज आने वाले कई वर्षों में और भी घिनौना दिखने वाला है। क्योंकि इसे दिशा देने वाला भीड़तंत्र है और भीड़तंत्र से निपटना आसान नहीं होता है।
क्या यह तस्वीर हमारी आने वाली पीढियां भी दिखाएंगी, क्योंकि यह तो सरेआम और कच्ची पौध के सामने हो रहा है। दूसरा, यह कि महिलाओं की रक्षा, सुरक्षा का इंतजाम क्या पुलिस के ही भरोसे है? समाज का काम सिर्फ नीति निर्धारण है? दरअसल समाज एक वह भीड़ है दो किसी एक पक्ष की तरफ झुक जाता है। उसके पास अधिकतर उस नीति का पालन करने या न करने के कोई तर्क या तथ्य नहीं होते हैं।
(2) मीडिया से-
चौथा स्तंभ, मीडिया। मीडिया का काम जन-जन तक उनके हित की ख़बरें पहुंचाना है, अगर एक वाक्य में और सरल ढंग से कहें तो। वह चाहे सरकारी नीतियां हों, चाहे कोई अन्य लाभकारी जानकारी या घटना-दुर्घटना। सब कुछ ईमानदारी से जनता तक पहुंचाना। अब यहाँ दो चीजें काम करती हैं। पहला पॉलिसी, दूसरा फिल्टर। पॉलिसी का काम घेरा बनाना है, नियम कायदे स्थापित करना है। इंडायरेक्ट कहें तो उन खबरों का चुनाव करना है, जिनसे मीडिया संस्था/संस्थान के हित में फैसले लिए जाते हैं। फिल्टर का काम उन खबरों का चुनाव होता है जोकि हमारी नीतियों के अनुरूप होती हैं।
यहाँ तक ठीक है। अब मची है होड़ ख़बर ब्रेक करने की, जहाँ आकर मानवता अपना दम तोड़ देती है। ख़बर ब्रेक होना जरूरी भी है, फील्ड में काम करने के लिहाज़ से, लेकिन जिस तरह की रिपोर्टिंग बिहार में देखने को मिली वह भी सबसे अलग चेहरा सामने लाती है। यहाँ पर महिला के निर्वस्त्र कर जब शहर में घुमाया जा हा था तो उस वक़्त मीडिया कवरेज हो रही थी। अपने-अपने संस्थानों में ब्रेक करने के लिए। उस वक्त जिस वक्त उस महिला को किसी की जरूरत थी कि उसे इस भीड़ से बचा ले और उसकी शरीर पर एक कपड़ा डाल दे। उस वक्त जब समाज के एक वर्ग का असली चेहरा सामने था तब मीडिया को अपनी ताकत दिखाने की जरूरत थी और उस महिला की सुरक्षा करनी चाहिए थी।
इस स्थिति में रिपोर्टरों की संख्या अधिक रही होगी। एकाध विजुअल्स बना लेता तो बाद में सभी एक दूसरे को विजुअल्स ट्रांसफर कर सकते थे, लेकिन यहां मीडिया मात खा गई। यह एक स्तर अधिक खतरनाक है जब हम मानवता और संवेदनशीलता से परे चले जाते हैं।

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