अगस्त माह- भाग 2 : इंसेफेलाइटिस क्या इसी तरह बच्चों को निगलता रहेगा?
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गोरखपुर ज़िले के ख़ोराबर ब्लॉक में राप्ती नदी के किनारे बसे बड़का भाठवा गांव। यहां रहने वाले जोगिंदर दिहाड़ी मज़दूरी का काम करते हैं। उनकी 9 साल की बेटी करीना ने 23 जुलाई 2018 की रात 9 बजकर 10 मिनट पर बीआरडी मेडिकल कॉलेज के इंसेफेलाइटिस वार्ड में दम तोड़ दिया।
मुख्य सड़क से उतरकर एक कच्ची पगडंडी पर चलकर हम जोगिंदर के घर पहुँचते हैं। कुछ दिन पहले ही घर में बच्ची की मौत हुई है, लेकिन फिर भी पेट भरने के लिए पिता को दिहाड़ी पर जाना पड़ा है। फूलों के प्रिंट वाली एक पुरानी साड़ी में लिपटी करीना की माँ उदास चेहरा ज़मीन की ओर झुकाए हुए घर के आंगन में झाड़ू लगा रही थीं। घर के नाम पर उनके परिवार के पास टिन की छत वाला एक पक्का कमरा था। इस कमरे के आगे एक झोपड़ीनुमा बैठक थी, जहां एक चारपाई पड़ी हुई थी।
करीना का स्कूल बैग दिखाते हुए उसकी माँ कहती हैं, "अबकी तीसरी में गई थी हमारी लड़की। लेकिन स्कूल ही नहीं जा पाई। पहले ही ख़त्म हो गई। उस दिन हमने उसके लिए दाल का पीठ और खीर बनाई थी। बड़े प्यार से खाई और सो गई। फिर पता नहीं क्या हुआ उसे अचानक रात को 12 बजे उठ के उल्टियाँ करने लगी। हाथ पैर इतनी ज़ोर से ऐंठे उसके कि छिल गए जगह-जगह से। आँखे ऊपर हो गई और झटके मारने लगी। हमने गोद में लिया तो शरीर तप रहा था। इतनी अकड़ रही थी कि हमसे संभल नहीं रही थी। फिर हम तुरंत उसको ब्लॉक अस्पताल ले गए तो वहां डॉक्टर से तुरंत सदर (ज़िला) भेज दिया।"
करीना गोरखपुर ज़िला अस्पताल में 10 दिन भर्ती रही और ठीक होने लगी थी। 10 दिन बाद उन्हें डिस्चार्ज कर वापस घर भेज दिया गया। घर आने के अगले ही दिन बुखार वापस आ गया।
उसकी माँ आगे बताती हैं, "अबकी बार लड़की न ही ताक रही थी और न ही बोल रही थी। किसी को नहीं पहचान रही थी। तीन दिन बाद सदर वालों ने मेडिकल कॉलेज भेज दिया। यहां डॉक्टर कुछ बताते ही नहीं। हम पूछते कि हमारी लड़की कैसी है बताओ तो हमको डांट कर चुप करवा देते। चार दिन मेडिकल में पड़ी रही। पाँचवे दिन ख़त्म हो गई। अगर सदर वालों ने लड़की को घर नहीं भेजा होता तो शायद बच जाती। लेकिन मैंने वहां देखा- बच्चा पूरी तरह ठीक हुआ हो या नहीं, सदर में सबको 10 दिन बाद छुट्टी दे देते थे। हमारी लड़की का इंसेफेलाइटिस पूरी तरह ठीक नहीं हुआ था तभी तो दोबारा वापस आया।"
3000 लोगों की आबादी वाले करीना के गांव में दो परिवारों को छोडकर किसी भी परिवार के पास शौचालय नहीं है। पीने के लिए भी यहां के लोग निजी हैंडपंपों के पीले प्रदूषित पानी पर निर्भर हैं। यहां यह बताना ज़रूरी है कि खुले में शौच से फैलने वाला ज़मीनी प्रदूषण, गंदगी और फिर कम गहराई वाले निजी हैंडपंपों का इस्तेमाल एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) फैलने का प्रमुख कारण है।
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सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार 1978 से 2018 तक 40 सालों में 10 हजार से अधिक मौतें सिर्फ बीआरडी मेडिकल कॉलेज में हुई हैं और इतने ही बच्चे विकलांग भी हुए हैं. क्या देश का कोई इलाक़ा इससे भी ज़्यादा बदनसीब हो सकता है जहां इतने बच्चों की लाशें दफ़नाईं गई हों? वह भी बिना किसी युद्ध और आपदा के?"
मैंने ये भी देखा कि कूड़ेदानों और निकासी के अभाव में गोरखपुर एक खुले सीवर की तरह बजबजा रहा था। बड़का भाठवा जैसे देहाती इलाक़ों का भी यही हाल था। गोरखपुर शहर के मुहाने पर मौजूद इस गांव में दस्तक अभियान का कोई पोस्टर नहीं लगा था। पहले और दूसरे फ़ेज़ की बात तो दूर, यहां निवासियों ने कभी किसी दस्तक अभियान ने बारे में सुना ही नहीं। करीना की दादी कहती हैं कि कभी कोई आशा उनके घर नहीं आई।
24 जुलाई 2018 तक जुटाए गए आकंडों के अनुसार बीआरडी मेडिकल कॉलेज में इस साल 196 बच्चे और 57 वयस्क इंसेफेलाइटिस के इलाज के लिए दाख़िल हुए। इसमें से 69 बच्चों और 13 वयस्कों की मृत्यु हो गई। अगस्त के साथ-साथ बरसात का मौसम यहां शुरू हुआ ही है। (पूरी रिपोर्ट बीबीसी की है।)
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