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आर्टिकल 15: एक बेहद मजबूत विषय पर बेहद कमजोर फ़िल्म

 क्या हम जानते हैं हमें कितना और कहाँ तक लड़ना है?


भारत का संविधान.

इसके बारे में लिखने की मेरी औकात नहीं है. मैं बात करूँगा फ़िल्म 'आर्टिकल 15' पर.

कहानी और पटकथा गौरव सोलंकी और अभिनव सिन्हा ने लिखी है. इन दोनों की जोड़ी ने इससे पहले 'मुल्क' लिखी थी. हालांकि गौरव ने 'मुल्क' के लिखने में उतना काम नहीं किया था, जितना कि 'आर्टिकल 15' में किया है.

फ़िल्म की कहानी
इस फ़िल्म की कहानी शुरू होती है एक गाने से. 'कहब त लग जाई धक् से'. इस गाने से ही शुरू होती है ऊंच-नीच की जंग. इसके बाद एक सीन आता है कि जिसमें दो लड़कियों के साथ एक चलती बस में मारपीट होती है. फ़िर अगले सीन में एक नया आईपीएस अफसर आता है अयान रंजन. उसके अगले ही दिन उन्हीं दोनों लड़कियों की लाशें पेड़ पर लटकती मिलती हैं. यहीं से शुरू होता है असली सफ़र.

जहां पर अयान रंजन की तैनाती हुई है वहाँ पर सारे पुलिसकर्मी भ्रष्ट हैं और उस मामले पर अयान को जांच नहीं करने देना चाहते. पुलिस के किरदार में मनोज पहवा मुख्य भूमिका में हैं. इसके साथ ही कुमुद मिश्रा ने भी अपनी मौजूदगी बखूबी दर्ज कराई है.

फ़िल्म इसी पर आगे बढ़ती है कि कैसे एक पुलिस अधिकारी एक रेप केस को दर्ज करने से लेकर उसे साबित करने के लिए जूझता है. इसके साथ ही आरोपी को पकड़ना तब मुश्किल हो जाता है जब सिस्टम उसके साथ न होकर आरोपी के साथ होता है.

पूरी फ़िल्म इसी केस पर बनी है और रेप पीड़िता के हक़ में यह फ़िल्म लड़ती हुई नज़र आती है. जिसमें यह सफ़ल भी हुई.



असफल कहाँ हुई?
यह फ़िल्म तो समानता के अधिकार पर बनी थी. ऐसा कोई भी वक़्त नहीं आया इस फ़िल्म को देखने के दौरान कि ये 'आर्टिकल 15' की बात कर रही है.

दलितों का आन्दोलन तो रेप केस के विरोध का हिस्सा है. और उसमें 'इन लोगों' शब्द का प्रयोग बेवजह किया गया है, जबकि जिस घटना को लेकर यह फ़िल्म बनी है उसकी सच्चाई ये थी कि उसमें पुलिस कार्रवाई हुई और दलित कोई आधार था ही नहीं. एक राजनीतिक पार्टी पर आरोपियों को बचाने का अरोप था.

दरअसल,
बदायूं दुष्कर्म और हत्या का मामला 2014 में हुआ था. उस समय उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव सरकार सत्ता में थी. आरोपियों के नाम पप्पू यादव, अवधेश यादव, उर्वेश यादव, छत्रपाल यादव और सर्वेश यादव थे. छत्रपाल और सर्वेश पुलिसकर्मी थे, जिनपर आरोप था. पुलिस विभाग पर आरोप लगाया गया था कि वह इस मामले में आरोपियों के प्रति समाजवादी पार्टी के राजनीतिक दबाव के कारण नरमी दिखा रही है.
जहाँ तक बात पात्रों के ब्राह्मण होने की है तो ये फ़िल्म है और इसे यह करने का पूरा अधिकार है.

हाँ, यह माना जा सकता है कि इस फ़िल्म में कुछ और घटनाएं भी शामिल की गई हैं, जिनके बल पर यह फ़िल्म समानता के अधिकार की बात करने की कोशिश करती है. जैसे सिर्फ़ एक ही जाति के लोग गटर साफ़ करते हैं, दलित को मंदिर में घुसने पर बैट से पीटा जाना.



किरदार कितने सफ़ल हुए?
आयुष्मान खुराना
अभिनेता के रूप में आयुष्मान खुराना ने फिट बैठने की कोशिश की है. पुलिस की भूमिका में उनके हाथ तंग नजर आए हैं. वो एनर्जी नहीं नज़र आती जितना उस किरदार के लिए ज़रूरी था.

मनोज पहवा
मनोज ने अपने किरदार में अपना पूरा दम लगाया है और वो सफ़ल भी हुए हैं. ज्यादा बोलकर हाफ़ जाना, कुटिलता, कुत्ते से प्यार इंसान से नफरत. बखूबी निभाया है.

कुमुद मिश्रा
कुमुद का काम हमेशा से ही बेहतर रहा है. कोई भी किरदार हो कुमुद उसी के होना अच्छी तरह जानते हैं. यहाँ जाटव की भूमिका में वो सफ़ल हुए हैं.

सयानी गुप्ता
मेकअप के बाद सयानी को देहाती लड़की दिखाने की कोशिश की गई है. इसमें इनका किरदार भी बढ़िया ही रहा है. कहीं कहीं सयानी खुद सामने आ जाती हैं और किरदार खो जाता है. 

ईशा तलवार
ईशा का काम आयुष्मान को व्यस्त रखना है. बाकी उन्होंने कोई अभिनय नहीं किया है.

मोहम्मद जीशान
जीशान ने हमेशा की तरह इस बार भी उम्दा अभिनय किया है. कम काम में भी अपनी मौजूदगी दर्ज करा दी है.

कुल मिलाकर
'आर्टिकल 15' एक बेहद संजीदा विषय पर जल्दबाजी में बनी कमजोर फ़िल्म है. इसकी कहानी पर अधिक काम किया जाना चाहिए था. डायलॉग भी मार्केट से लिए हुए लगते हैं. इस फ़िल्म से पहली बार गौरव सोलंकी ने फ़िल्म लेखन की है. हालांकि गौरव की कहानियाँ इस लेखन से बहोत ऊपर हैं. फ़िल्म की कहानी पर शोध नहीं हुआ है.
यह फ़िल्म 'समानता के अधिकार' की बात करने में असफल हुई है.

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