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कबीर सिंह: प्रेम की एक पाक़ कहानी जो समाज को कभी नहीं भाएगी

कबीर सिंह बताता है कि प्रेम की एक सीमा होती है, जिसे लांघकर प्रेम को पाया जा सकता है.


इसमें क्या आश्चर्य? प्रीति जब प्रथम–प्रथम जगती है‚
दुर्लभ स्वप्न–समान रम्य नारी नर को लगती है।

कितनी गौरवमयी घड़ी वह भी नारी जीवन की‚
जब अजेय केसरी भूल सुधबुध समस्त तन मन की‚
पद पर रहता पड़ा‚ देखता अनिमिष नारी मुख को‚
क्षण–क्षण रोमाकुलित‚ भोगता गूढ़ अनिर्वच सुख को!

यही लग्न है वह जब नारी‚ जो चाहे‚ वह पा ले‚
उडुपों की मेखला‚ कौमुदी का दुकूल मंगवा ले।
रंगवा ले उंगलियां पदों की ऊषा के जावक से‚
सजवा ले आरती पूर्णिमा के विधु के पावक से।

तपोनिष्ठ नर का संचित तप और ज्ञान ज्ञानी का‚
मानशील का मान‚ गर्व गर्वीले‚ अभिमानी का‚
सब चढ़ जाते भेंट‚ सहज ही‚ प्रमदा के चरणों पर‚
कुछ भी बचा नहीं पाता नारी से उद्वेलित नर।

किंतु‚ हाय‚ यह उद्वेलन भी कितना मायामय है!
उठता धधक सहज जितनी आतुरता से पुरुष हृदय है‚
उस आतुरता से न ज्वार आता नारी के मन में‚
रखा चाहती वह समेट कर सागर को बंधन में।

किंतु‚ बंध को तोड़ ज्वार जब नारी में जब जगता है‚
तब तक नर का प्रेम शिथिल‚ प्रशमित होने लगता है।
पुरुष चूमता हमें अर्ध निंद्रा में हम को पा कर‚
पर‚ हो जाता विमुख प्रेम के जग में हमें जगा कर।

और‚ जगी रमणी प्राणों में लिये प्रेम की ज्वाला‚
पंथ जोहती हुई पिरोती बैठ अश्रु की माला।

कविता समझ में आई आपको? इसका भाव, इसका सार? ये कविता दिनकर जी की लिखी हुई है. मैं इसे कविता मानता हूँ. बाकी बात जो मैं करने जा रहा हूँ वो इसके उदय से संबंध नहीं रखता है.

मेरी बात आपसे कबीर सिंह को लेकर हो रही है. वही कबीर सिंह जो एक नायक है, जो बहुत गुस्सैल है, जो लड़कियों से संभोग के लिए पागल है, जो बेहूदा आशिक है. कबीर सिंह नायक है 'कबीर सिंह' फ़िल्म का.

इस पर मेरी प्रतिक्रिया पढ़ने से पहले आप दिनकर जी की ऊपर लिखी कविता फ़िर से पढ़ लें.

हाँ. तो बात शुरू होती है कि इस फ़िल्म ने क्या परोसा और हमने 🎫 टिकट खरीदकर कितना खाया और क्या खाया?

मैं इस फ़िल्म का रिव्यू कुछ हिस्सों में करने वाला हूँ -
1) कहानी और कबीर 
2) किरदार और समाज 
          A) सिनेमाघर के अंदर का समाज 
          B) सिनेमाघर के बाहर का समाज 

ये रिव्यू सामान्यतः रिव्यू की तरह नहीं है तो थोड़ा इत्मीनान से पढिएगा.

1) कहानी और कबीर 

इस कहानी के पात्र काल्पनिक नहीं हैं. यह कहानी जानने के बाद पता चलता है. इसका लेखक इस पूरे वाकिए से गुजर चुका है. इसे काल्‍पनिक रूप देकर सजाया सँवारा गया है.

कबीर सिंह क्या है?
इस कहानी को जानने के बाद पता चलता है कि कबीर सिंह जो अपने मन का काम करने वाला, गुस्से से भरा हुआ लड़का है उसकी कमजोरी है 'लड़की'. यहां लड़की का मतलब सिर्फ़ गर्लफ्रेंड नहीं माना जाना चाहिए. जब होली के दौरान वो अमित को मारता है तो उस समय उसकी वेदना उसकी गर्लफ्रेंड होती है. लेकिन, जब फ्लैशबैक में फ़िल्म शुरु होती है तो उसकी दादी से उसका लगाव भी दिखाया गया है. कबीर की दादी, उसके बचपन की गुड़िया और अब उसकी गर्लफ्रेंड प्रीती.

कबीर सिंह पागल है ?
कबीर बिगड़ैल जरूर है, लेकिन उसे अपने कैरियर का भी ध्यान है. प्रीती उसको दो दिन का समय देने के लिए कहती है, लेकिन वो मास्टर्स करने जाता है. प्रीती को उसके हॉस्टल छोड़कर. इन सब के बावजूद वो प्रीती के लिए पागल है. 

उसका गुस्सा प्रीती के सामने नरम पड़ जाता है. उससे थप्पड़ भी मार खाता है और उसको मनाता भी है. वो प्रेम की अति में पड़ चुका है. और, उसे सिर्फ़ प्रीती ही चाहिए. उसका प्रेम तब और दिखता है जब उसे ये बात पता चलती है कि प्रीती की रूममेट ये पूछती हैं कि तुम दोनों के बीच कितनी बार हुआ है, और ये बात कबीर को बुरी लगती है. उसका जवाब होता है कि, 'ये क्यूँ नहीं पूछा जा रहा कि तुम दोनों फ़ैमिली कैसे प्लान करोगे या शादी कब करोगे.'

कहानी कबीर के इर्दगिर्द घूमती है. इसलिए इसमें महिला पात्रों को लीक में नहीं रखा गया है. जितना भी प्रीती सिक्का यानी कियारा और कबीर सिंह यानी शाहिद कपूर के बीच फ़िल्म आई दरअसल इतनी ही कहानी है. बाकी सभी इसे पूरा करने में साथ निभाने का काम करते हैं. 

कहानी एक दिल टूटे आशिक की है. दिल टूटे लड़के की है. दिल टूटे स्टूडेंट की है. दिल टूटे बेटे और भाई की है. जिस हद तक या जिस अति तक वो प्रीती से प्रेम करता है वो चाहता है कि प्रीती भी उससे उतना ही प्रेम करे. और, वो करती भी है. लेकिन, जब बात शादी की आती है तो प्रीती बैकफुट पर आ जाती है. थोड़ा कोशिश के बाद हार मान लेती है. 

जब कबीर 6 घंटे का वक़्त देकर जाता है तब उसे कबीर के लिए कुछ करने का मौका मिलता है और वो परिवार के ख़िलाफ़ हो जाती है. कबीर से मिलने आती है, लेकिन मिल नहीं पाती और दूसरे दिन उसकी शादी हो जाती है. 

शादी हुई, कबीर घर गया उसके, वो शादी के बाद कबीर की तरफ़ मुड़कर भी नहीं देखती और उसकी फ़ैमिली कबीर को पीट देती है. 

कबीर मार खाकर घर आया. बाप ने भी घर से लिकाल दिया. इन सब के बीच एक इंसान जो छोटी बात पर उत्पात मचा देता है वो डिप्रेशन में चला जाता है और नशा करने का आदी हो जाता है. उसका विश्वास प्रेम से उठ जाता है, और उसे शारीरिक सुख चाहिए होता है. यहाँ कहानी थोड़ी मसालेदार बनाने की कोशिश की गयी है. फिर भी कबीर बिना लड़कियों की मंजूरी के उनके साथ कुछ भी नहीं करता है. 

एक सीन जिसमें चाकू दिखाकर लड़की से कपड़े उतारने को कहता है, वहाँ कबीर लड़की की मंजूरी से आया है. एक गाना सुनकर वो घर से बाहर निकल जाता है. 

पूरी फ़िल्म में कबीर की ज़ुबान पर सिर्फ़ प्रीती रहती है. तो यह फ़िल्म महिला विरोध में तो बिल्कुल भी नहीं है. जहाँ भी थप्पड़ मारा गया वहां प्रेम का अधिकार और स्वीकार है. जहाँ भी कबीर घुटनों पर बैठा या प्रीती उसको मनाती हुई दिखी वो प्रेम है और सिर्फ़ प्रेम है. 

जब कबीर अभिनेत्री के साथ होता है तो दोनों एक दूसरे से वादा करते हैं कि न इमोशन होगा न प्यार. तो, इसे फ़िल्म का एक हिस्सा ही समझा जाए जो मसलन सभी फ़िल्म में होता है.
 


2) किरदार और समाज 
मेरे हिसाब से फ़िल्म का समाज दो हिस्सों में बंटा होता है. पहला होता है सिनेमाघर के अन्दर का समाज और दूसरा सिनेमाघर के बाहर का समाज. 

A) सिनेमाघर के अन्दर का समाज 
यह समाज दो तरह से प्रभावित होता है. पहले फ़िल्म की कहानी Teaser या Trailer से समझकर. दूसरा सिनेमाघर में फ़िल्म देखकर. ये फ़िल्म देखने तभी जाते हैं जब इन्हें Teaser या Trailer पसंद आता है. 

कबीर सिंह को इस समाज ने स्वीकार किया है. लगातार सीटियां बजाई हैं और हर एक सीन पर खुद को फ़िल्म से जोड़ कर रखा है. इसका कबीर सिंह फ़िल्म के Director का Writer का कबीर सिंह है, जिसे इन्हीं के बीच से खोज के निकाला गया है. 

इस फ़िल्म के किरदार अपनी जगह सही हैं. और, एक प्रेम के बीच अवरोध को बखूबी दर्शाते हैं. 

2) सिनेमाघर के बाहर का समाज 
यह समाज वो भीड़ होती है जो उन सब चीजों पर कानून बनाती है जो वो खुद छुपाकर करती है. ये लोग ऐसी फिल्मों यानी इस विषय पर नाराज हो जाते हैं. जबकि, इन्होंने भी वह सब कुछ किया और जीया है जो फ़िल्म का नायक कबीर कर रहा है. 

इसे एक बेहूदी फ़िल्म बताकर किनारे कर दिया जाता है, जबकि इनके दोस्तों के बीच ये बातें नॉर्मल होती हैं और ये खुद उसमें शामिल होते हैं.
सिनेमाघर के बाहर का समाज सिनेमाघर के अन्दर बैठे समाज को गालियाँ दे रहा होता है. 

कुल मिलाकर - 
अब, मैं आता हूँ इतना सब कुछ लिखने के मतलब पर. 

प्रेम. इसमें लड़का-लड़की या तो शादी कर लेते हैं या अलग हो जाते हैं. इससे आगे कुछ नहीं होता. अब इसके दो बात होती है कि किसने अलग होने का फ़ैसला लिया और किसने प्रेम को बचाने की कोशिश की. 

पहला, जिसमें लड़की अलग होती है. इस स्थिति में लड़का वो सब कोशिशें करता है, जिनसे वो अपनी प्रेमिका को रोक सके. जब सफ़ल नहीं होता है तो वह टूट जाता है. इसी का नतीजा है 'कबीर सिंह' . 

दूसरा, जिसमें लड़का अलग होता है. ऐसे में लड़की भी वही कोशिशें करती है जो लड़का करता है. यह भी उसी तरह टूट जाती है जिस तरह 'प्रीती' टूट जाती है. 

तो, इस फ़िल्म में न तो महिला का उत्पीड़न हुआ है. न तो पुरुष ने नारी को चरित्रहीन बताया है. न तो महिला ने पुरुष का उत्पीड़न किया है. 

अगर ऐसा हुआ आप मानते हैं तो कबीर के साथ प्रीती ने अधिक हिंसा की है. कबीर ने एक ही थप्पड़ मारा, जबकि प्रीती ने कई मर्तबा ऐसा किया है. जब कबीर शादी की बात करता है तो वह शून्य हो जाती है. कबीर उसके लिए उसके घर मार खाता है तो वह शून्य हो जाती है. 

अगर 'सीक्रेट गेम' जैसी फिल्मों और 'Alt Balaji' को आप स्वीकारते हैं तो 'कबीर सिंह' को नकारने का आपको कोई हक़ नहीं. देवदास, राधे और न जाने कितने किरदार हैं जिन्हें जगह मिली है. 

अगर फ़िर भी कुछ नहीं समझ आ रहा तो गुरु आपको अति वाली मोहब्बत हुई ही नहीं है. 

1 comment:

  1. गुरु अतिवाली मोहब्बत को हम समझते हैं और हां रिव्यू बहुत ही शानदार व हटके हैं.

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