TIK-TOK और #TREND के दौर में राष्ट्रवाद और जय श्रीराम की बात करना अंधभक्ति है!
अंधभक्ति भगवान में दिखाओ बच्चा, विचारधारा में नहीं
हालांकि इस बीच कुछ लोगों ने उन्हें चुप रहने के लिए कहा, लेकिन जैसे ही ममता मंच पर आईं तो एक बार फिर एक सुर में सभी ने जय श्रीराम के नारे लगाए। इसके बाद हो गई गड़बड़। ममता बनर्जी ने कहा ‘मैं आभारी हूं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कला एवं संस्कृति मंत्रालय का, जिन्होंने कोलकाता में इस कार्यक्रम का आयोजन किया। मुझे लगता है कि सरकार के कार्यक्रम की एक मर्यादा होनी चाहिए। यह कार्यक्रम किसी पार्टी का नहीं है. यह सभी दलों का कार्यक्रम है, आम लोगों का कार्यक्रम है। लेकिन किसी को बुलाकर उसको बेइज्जत करना आपको शोभा नहीं देता।’ ममता बनर्जी ने आगे कहा, ‘मेरे साथ जो व्यवहार यहां हुआ है, उसके विरोध में मैं कुछ नहीं कहूंगी। जय हिंद, जय बांग्ला।’
ये बात यहीं पर खत्म हो गई, लेकिन जब कोई बात निकलती है तो ख़त्म नहीं होती। दरअसल, भाजपा की सरकार 2014 में केंद्र में बनने या फिर 2017 में उत्तर प्रदेश में बनने का दौर रहा हो, राम भक्तों को जय श्रीराम बोलने से रोकने का ड्रेंड बन गया। जो भी कोई बंदा ये जयघोष करता पाया जाता है उसे 'मोदी भक्त' कहा जाता है न कि श्रीराम का भक्त। ये इनकी भी गलती नहीं है। दरअसल ये भारत का वो युवा है जो TIK-TOK और #TREND के दौर में जी रहा है। इस दौर की खासियत ही यही है कि जो भी चीज कोई भीड़ कह रही है वही सही है। तुम्हारा धर्म क्या है, तुम्हारी संस्कृति और परंपरा क्या है इससे तुम्हें ताल्लुकात रखने की कोई जरूरत नहीं है।
सार्वजनिक तौर पर अपने भगवान को याद करना या अपने धर्म और धर्म द्वारा माने गए भगवानों के प्रति कृतज्ञता जताना अंधभक्ति करार दे दी जाती है। और, वो लोग जो लिबरल हैं यानी महा ज्ञानी जिन्हें कुछ एक विशेषणों के साथ अर्बन नक्सल कहा गया है, ये वही हैं जो इस युवा पीढ़ी को समझा रहे हैं कि बेटा ट्रेंड के साथ रहो तभी ज्ञानी समझे जाओगे। कोई भगवान पर टिप्पणी करे तो इसे कूल डूड की तरह स्वीकार कर लो क्योंकि नए भारत का ट्रेंड ही यही है। नया भारत जो अपने ईश्वर का अपमान करे और कहे कि मैं ऐसे पाखंड नहीं करता। मैं खुद पर विश्वास रखता हूं। लेकिन, एक मिनट जब किसी और के साथ नारे लागने लग जाते हो तब कहां चली जाती है तुम्हारी बुद्धि। किस कागज की पुड़िया का रूप ले लेती है और कहां चली जाती है?
ज्ञानियों तुम्हें निबरलयी करते जरा भी शर्म नहीं आती जब किसी और के गीत बड़ी ही सुंदरता के साथ गाते हो और अपने ही धर्म को मानने उसकी संस्कृति का पालन करने में लज्जा महसूस करते हो? तुम्हारे जन्म के सयम मां-बाप ने न जाने कितनी प्रार्थनाएं की होंगी न जाने कितने धाम की यात्रा करने का वचन दिया होगा कि तुम सकुशल इस धरती पर आ जाओ और तुम आ भी गए। अब तुममे एक ज्ञान का प्रकाश आया और तुम महाज्ञानी हो गए। तुम्हें भगवान को पूजना व्यर्थ लगने लगा।
उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष, उन्होंने कहा कि हम भगवान कृष्ण की मूर्ति लगाएंगे अयोध्या वाली रामजी की मूर्ति से बड़ी। अरे क्या कर रहे हो। किस ओर ले जा रहे हो इस पीढ़ी को। भगवानों को बांटना शुरू कर दिया। यानी आपके हिसाब से राम जन्मभूमि स्थल पर भगवान राम का मंदिर बनाया जाना बस एक चुनावी काम था, जो तुम भगवान कृष्ण की ओर मोड़े जा रहे हो। भगवान कृष्ण भगवान राम ही हैं और भगवान राम ही भगवान विष्णु, अगर थोड़ा सा भी हिन्दू धर्म की मान्यताओं पर विश्वास रह गया हो तो डीएनए में परिवर्तन न आया हो तो ये पता ही होगा। बिल्कुल बनाइए भगवान कृष्ण की मूर्ति, लेकिन उन्हें इस उद्देश्य से न स्थापित कीजिएगा कि ये ले लिया बदला मैंने राम मंदिर निर्माण का। क्योंकि जयश्रीराम यह एक सनातनी का गर्व है। ये किसी पार्टी विशेष का अधिकार नहीं है।
मैं बात करना चाहता हूं आज के युवा से। क्या समझते क्या हो अपने आपको? अपने ईष्ट का अपमान करना कबसे कूल डूड का सिंबल बन गया? अपने माता-पिता से पूछो अगर वो ईश्वर में आस्था रखते हों तो, कि क्या होती है भक्ति और क्या होता है इसका साइकोलॉजिकल प्रभाव। आध्यात्म जानते हो न? मैं अपनी सारी बात हल्के स्वर में ही कह रहा हूं, मुझे पता है कि ये बात बुरी लगेगी लेकिन ये भावना आहत करने नहीं बल्कि मरी हुई भावना की इज्जत करने के लिए लिख रहा हूं।
हम भारत के लोग हैं। यहां हमें सिखाया जाता है कि सभी धर्मों का सम्मान करो, सभी के विचारों का सम्मान करो। हम ये सीखते तो हैं, लेकिन ये क्यों भूल जाते हैं कि हमें ये भी सिखाया गया है कि हमें अपने धर्म का भी सम्मान करता चाहिए। और, हमारा धर्म सिर्फ यही नहीं है कि हम अपने ईष्ट को पूजें, हमारा धर्म ये भी है कि हम बराबर उनका सम्मान करें। न तो किसी धर्म की उपेक्षा करें और न ही किसी भी हाल में अपने धर्म की उपेक्षा होने दें। हमारा दायित्व अपनी संस्कृति को बचाए रखने का है।
राष्ट्रवाद की बात करना कब से एक पार्टी का प्रतीक बन गया? जो सेना के जवान देश की रक्षा में लगे हैं वो किसके लिए हैं? इस राष्ट्र की रक्षा के लिए न, देश के लोगों के लिए न, देश की मिट्टी के लिए न? किस किताब और संविधान में ये लिखा गया है कि राष्ट्रवाद की बात करना मतलब अलगाव की बात करना है? राष्ट्र का मतलब ही एकता से है। लोगों से मिलकर बनता है एक राष्ट्र तो बिना लोगों को एकसाथ लिए राष्ट्र की परिकल्पना भी नहीं की जा सकती है। राष्ट्रवाद का मतलब यह कतई नहीं है कि हम फ्रीडम के नाम पर अपने ही देश का भद्दा मजाक बनाएं और हाथ में माइक लेकर किसी ओपन माइक शो में कूल डूड नजर आएं।

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