Header Ads

यूपी में 15 साल हिन्दुओं की आस्था का दमन हुआ, विक्टिम कार्ड खेलने वाले कह रहे- 8 सालों में बुराई फैलाई गई है

 

up stone pelting

इस समय पूरे भारत में एक डरावना माहौल बना हुआ है। पिछले 2 शुक्रवार से (जून 2022 में) मस्जिदों से निकलने के बाद नमाजियों द्वारा पत्थरबाजी करने की घटनाएं सामने आई हैं। दूसरी बार तो इस उग्र प्रदर्शन और हिंसा ने पूरे भारत को अपने चपेट में ले लिया। यह सारा माहौल भाजपा की प्रवक्ता रहीं नूपुर शर्मा के पैगंबर साहब को लेकर दिए गए एक बयान के बाद बना है।

वामपंथी संगठन विक्टिम कार्ड खेल रहे, रोना-पिटना मचा रखा है
अब इस माहौल में वामपंथी संगठन और इन संगठनों के नेताओं के साथ ही विपक्ष, मुस्लिम संगठन इस बात की दुहाई देते हुए विक्टिम कार्ड खेल रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस ऐसा माहौल बनाना चाहती थी। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसा माहौल बनाने के लिए 8 साल से यानी साल 2014 से इस काम में लगे हैं।

एकतरफा रिपोर्टिंग तो अखिलेश यादव के शासनकाल में हुई
अगर ऐसा है तो क्या भारत में ऐसे दंगे पहले कभी नहीं हुए? सांप्रदायिक रंग कभी नहीं दिया गया? दंगों के बाद की रिपोर्टिंग कैसी रही? क्या सिर्फ ऐसा भाजपा के शासनकाल में हुआ है? आपको रिपोर्टिंग का उदाहरण देखने के लिए साल 2012 में हुए फैजाबाद के दंगों की रिपोर्टिंग पढ़नी चाहिए। एक तरफा और एक ही पीड़ित पक्ष। 




पिछले 15 साल में (योगी शासनकाल छोड़कर) हिन्दुओं की आस्था को दबाया गया
सिर्फ उत्तर प्रदेश को लेकर अगर चलें तो यहां पर जिस तरह का माहौल पिछले 15 साल में (योगी शासनकाल छोड़कर) तैयार हुआ वह हिन्दुओं की आस्था के विपरीत तैयार हुआ। उन्हें यह याद दिलाया गया कि तुम्हें बस इतना ही अधिकार है, बाकी अगर इधर-उधर किया तो दंगा होगा या पुलिस से लाठियां खानी पड़ेंगी।

अखिलेश यादव सरकार के 2012 से 2017 तक के कार्यकाल का विश्लेषण करें
विक्टिम कार्ड खेलने वालों को सिर्फ अखिलेश यादव सरकार के 2012 से 2017 तक के कार्यकाल को देखना और उसका विश्लेषण करना चाहिए कि इस तरह का माहौल कब से और किस तरीके से बनाया जा रहा था। अखिलेश यादव तो आज की तारीख में भी ऐसा करने से नहीं चूकते हैं, जो उनको 2027 में 2032 की तैयारी की तरफ धकेलता दिख रहा है। 2012-2017 के दौरान डर का माहौल बनाया गया, लेकिन किसके लिए ये कुल सात मामलों को पढ़कर आप समझ सकते हैं।


कुछ मामले पढ़िए और बताइए कि ये नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के कारण माहौल बना या विपक्ष ने अपने शासनकाल में ही तैयार किया है।:-

मामला नंबर एक


10 साल पहले 2012 में यूपी में आतंकियों का मुकदमा वापस लेने की कोशिश हुई
आज से ठीक 10 साल पहले अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। साल था 2012 यानि नई-नई सरकार थी। वाराणसी-फैजाबाद और लखनऊ की कचहरियों में सिलसिलेवार बम धमाकों की पांचवी बरसी से ठीक पहले यूपी में अखिलेश यादव सरकार को न्यायालय की कड़ी फटकार मिली।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नाराजगी जताई
मार्च 7, 2006 को वाराणसी के संकटमोचन मंदिर और कैंट रेलवे स्टेशन पर हुए सीरियल ब्लास्ट में अभियुक्तों के खिलाफ से मुकदमे वापस लेने के अखिलेश सरकार के प्रयासों पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्त नाराजगी जताई।

अखिलेश सरकार को लगाई जबरदस्त फटकार
जस्टिस आरके अग्रवाल और जस्टिस आरएसआर मौर्या की खंडपीठ ने इस याचिका की सुनवाई करते हुए सरकार से अपनी तल्ख़ टिपण्णी में पूछा कि "संदिग्ध आतंकियों पर से मुकदमा हटाने की पहल कर क्या सरकार आतंकवाद को बढ़ावा नहीं दे रही है। आज आप आतंकियों को छोड़ देंगे, तो क्या कल उनको पद्मभूषण से भी नवाज़ देंगे।"


नई-नई सरकार और आतंकियों के मुकदमे वापस लेना पहला निर्णय?

2012 में अखिलेश यादव ने सरकार बनाई और इसी के साथ आतंकियों पर चल रहा मुकदमा वापस लेने की याचिका लगा दी। ऐसे कैसे? कुछ तो सोचा समझा और प्लान किया रहा होगा न? किसने कहा कि मुकदमे वापस लो और किसका इतना बड़ा दबाव था इनपर? RSS, BJP की तो ये सुनते ही नहीं है तो आदेश किसका मान रहे थे ये?

गाजियाबाद जिला एवं सत्र न्यायालय ने आतंकी को फांसी की सजा सुनाई है
वाराणसी में हुए सीरियल ब्लास्ट केस में गाजियाबाद जिला एवं सत्र न्यायालय ने आतंकी वलीउल्लाह को फांसी की सजा सुनाई है। वाराणसी के संकट मोचन मंदिर और कैंट रेलवे स्टेशन पर 2006 में सीरियल बम ब्लास्ट हुए थे। इन धमाकों में 18 लोगों की मौत हुई थी और 35 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। उसी शाम को दशाश्वमेध घाट पर भी विस्फोटक मिले थे। वाराणसी पुलिस ने 5 अप्रैल 2006 को इस मामले में इलाहाबाद के फूलपुर गांव निवासी वलीउल्लाह को लखनऊ के गोसाईंगंज इलाके से गिरफ्तार किया था।

मामला नंबर दो


2012 में फैजाबाद में दंगा भड़का
24 अक्तूबर 2012 की शाम फैजाबाद के चौक इलाके में दुर्गा प्रतिमा विसर्जन के जुलूस में एक लड़की के साथ अभद्रता और दुर्गा की प्रतिमा तोड़े जाने की अफवाह फैलते ही बवाल शुरू हो गया। थोड़ी ही देर में इसने सांप्रदायिक रंग अख्तियार कर लिया।

एसपी सिटी का फोन बंद था, तीन घंटे जमकर बवाल हुआ
मौके पर मौजूद एसपी सिटी राम सिंह यादव से स्वयं पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) एसी शर्मा ने उत्पातियों पर आंसू गैस छोडऩे और रबड़ बुलेट चलाने को कहा लेकिन उनके आदेश को लागू करने की बजाए यादव ने अपना मोबाइल स्विच ऑफ कर दिया। पुलिस तीन घंटे तक उत्पातियों के आगे मूकदर्शक बनी रही।

100 से ज्यादा दुकानें जलकर राख हुईं, कई इलाकों में दंगा फैला
चौक इलाके में तीन दर्जन दुकानें आग के हवाले कर दी गईं। फैजाबाद शहर में भड़का दंगा रुदौली, भदरसा, पिपरी जलालपुर और शाहगंज जैसे ग्रामीण इलाकों में पहुंच गया। इससे दो लोगों की जान चली गई। 100 से ज्यादा दुकानें और घर जलकर खाक हो गए। सपा के सात माह के शासन काल में राज्य में सांप्रदायिक हिंसा की 9 घटनाएं हो चुकी थीं।

मामला नंबर तीन


2013 में 84 कोसी परिक्रमा पर रोक, धारा 144 लागू, छावनी में तब्दील उत्तर प्रदेश
अयोध्या में 84 कोसी परिक्रमा पर तत्कालीन अखिलेश सरकार ने रोक का एलान किया था। विश्व हिन्दू परिषद (वीएचपी) ने रविवार को अयोध्या से अपनी विवादास्पद यात्रा की प्रतीकात्मक शुरूआत की, जबकि प्रशासन ने जबर्दस्त धरपकड़ के बीच संगठन के शीर्ष नेताओं प्रवीण तोगड़िया, वेदांती और अशोक सिंघल को गिरफ्तार कर लिया। 



फैजाबाद में 625 लोगों को गिरफ्तार किया गया
तोगड़िया को जहां अयोध्या से गिरफ्तार किया गया, वहीं सिंघल को लखनऊ हवाई अड्डे से हिरासत में लिया गया। फैजाबाद में 625 लोगों को गिरफ्तार किया गया था। लगभग सभी जिलों में धारा 144 लागू कर दी गई थी।

आजम खान ने कहा था- किसी भी सूरत में यात्रा नहीं होने दी जाएगी
यूपी सरकार के मंत्री आजम खान ने कहा था कि किसी भी सूरत में यात्रा नहीं होने दी जाएगी। कोसी परिक्रमा से पहले अयोध्या को छावनी में तब्दील कर दिया गया। इलाके में प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े बंदोबस्त किए। सरयू घाट और आसपास के इलाकों में बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों के जवान तैनात किए गए।

कई जिलों में धारा 144 लागू किया गया
फैजाबाद और अयोध्या समेत गोंडा, अंबेडकरनगर, बाराबंकी, बहराइच, बस्ती जिलों में धारा 144 लागू की गई। बाराबंकी से फैजाबाद के सभी रास्तों पर पुलिस और दूसरे सुरक्षा बल तैनात किए गए।



मामला नंबर चार

मुजफ्फरनगर दंगा 2013, 62 लोगों की मौत हुई
खबरों के मुताबिक, जाट और मुस्लिम समुदाय के बीच झड़प 27 अगस्त 2013 को शुरू हुआ। कवाल गांव में कथित तौर पर एक जाट समुदाय लड़की के साथ एक मुस्लिम युवक ने छेड़खानी की। उसके बाद लड़की के दो ममेरे भाइयों गौरव और सचिन ने उस मुस्लिम युवक को पीट-पीट कर मार डाला। जवाबी हिंसा में मुस्लिमों ने दोनों युवकों की जान ले ली।

किसानों के 18 ट्रैक्टर और तीन मोटरसाइकिलें फूंक दीं
07 सितंबर को महापंचायत से लौट रहे किसानों पर जौली नहर के पास दंगाइयों ने घात लगाकर हमला किया। दंगाइयों ने किसानों के 18 ट्रैक्टर और तीन मोटरसाइकिलें फूंक दीं। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक उन लोगों ने शवों को नहर में फेंक दिया। छह शवों ढूंढ निकाला गया। इस दंगे में एक फोटोग्राफर और पत्रकार समेत 62 लोगों की मौत हुई।

मामला नंबर पांच


साल 2015: गणेश प्रतिमा के विसर्जन को लेकर वाराणसी में साधु-सतों की पिटाई की गई
वाराणसी में साधू-संतों, बटुकों पर इसलिए लाठीजार्च किया गया क्योंकि वह अदालत के आदेश (गंगा में मूर्ति विसर्जन नहीं होगा) की अनदेखी करके गंगा जी में मूर्ति विसर्जन करने जा रहे थे। सरकार, शासन और स्थानीय प्रशासन ने इस बात का तो ध्यान रखा कि अदालत के आदेश की अवहेलना न हो, परंतु वह अदालत के उस आदेश को भूल गए, जिसमें उसने कहा था कि मूर्ति विजर्सन के लिये प्रशासन वैकल्पिक व्यवस्था करेगा।

1000 ये ज्यादा लोगों पर मारपीट और दंगा भड़काने का मुकदमा
अगर मूर्ति विसर्जन के लिये वैकल्पिक व्यवस्था कर दी गई होती तो साधू-संतों को गंगा नदी में विसर्जन के लिये कूच नहीं करना पड़ता। तत्कालीन सरकार के समय में 1000 ये ज्यादा लोगों पर मारपीट और दंगा भड़काने का मुकदमा भी पुलिस ने दर्ज कर लिया था। गणेश प्रतिमा को गंगा में विसर्जित करने के मसले को लेकर वाराणसी के गोदौलिया पर दो दिनों से चल रहे धरने का परिदृश्य आगाज के करीब 30 घंटे बाद 22 सितंबर की आधी रात लगभग एक बजे बदल गया। 




पुलिस ने भांजी लाठियां, गलियों में खोजकर पीटा
पुलिस ने पहले ध्वनि विस्तारक यंत्र से धरने को गैर कानूनी बताते हुए लोगों को हट जाने की हिदायत दी। इसके बाद भी हजारों लोगों के टस से मस न होने पर पुलिस ने लाठी भांज दी, इससे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद, बटुक समेत धरना दे रहे कई लोग घायल हो गए। पुलिस के बल प्रयोग के चलते लोग गिरते पड़ते वहां से गलियों में भागे। पुलिस ने गली में भी तलाशी अभियान चलाया। देखते ही देखते गोदौलिया चैराहे पर सन्नाटा पसर गया।

मामला नंबर छ:


 

साल 2015 में कांवड़ यात्रा के दौरान डीजे बजाने पर रोक लगा दी
राज्य सरकार (तत्कालीन अखिलेश यादव सरकार) ने 27 जुलाई 2015 को पूरे प्रदेश में कांवड़ यात्रा के दौरान डीजे बजाने पर रोक लगा दी। इसका विरोध भी कई संगठनों ने किया। तत्कालीन मुख्य सचिव अलोक रंजन ने विडियो कॉन्फ़्रेंसिंग करके सभी जिलों के पुलिस अधीक्षकों को इस बाबत निर्देश जारी कर दिया गया था।
 

अखिलेश ने कहा- इससे शोर होता है और कुछ नहीं
सीएम अखिलेश यादव ने अपने सरकार के उस फैसले का समर्थन किया, जिसमें कांवड़ यात्रा के दौरान डीजे और लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर रोक लगाई गयी। अखिलेश ने कहा कि कांवड़ियों को भजन के लिए डीजे की क्या आवश्यकता। इससे बिना मतलब का शोर अलग से पैदा होता है, जिससे दूसरे लोग परेशान होते हैं। भजन में शोर कि कोई आवश्यकता नहीं।

मामला नंबर सात


 


मथुरा के जवाहर बाग में 2 जून 2016 को हिंसा हुई

मथुरा के जवाहर बाग में 2 जून 2016 को हिंसा हुई थी, जिसमें दो पुलिस अफसरों समेत 29 लोगों की जान चली गई थी। 2 जून 2016 को जवाहर बाग को कब्जामुक्त कराते हुए तत्कालीन एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी और तत्कालीन थाना प्रभारी फरह संतोष यादव शहीद हो गए थे। जवाहर बाग हिंसा में 27 लोग भी मारे गए थे।



No comments

Powered by Blogger.